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Thirukkural in Hindi Chapter 111 to 115 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 111-115
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Thirukkural in Hindi, Chapters 111 to 115
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Chapters 106 to 110 · All chapters · Chapter list · Chapters 116 to 120

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–३: काम- कांड

अध्याय 111. संयोग का आनन्द
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1101 पंचेन्द्रिय सुख, रूप औ’, स्पर्श गंध रस शब्द ।उज्ज्वल चूड़ी से सजी, इसमें सब उपलब्ध ॥
1102 रोगों की तो है दवा, उनसे अलग पदार्थ ।जो सुतनू का रोग है, दवा वही रोगार्थ ॥
1103 निज दयिता मृदु स्कंध पर, सोते जो आराम ।उससे क्या रमणीय है, कमल-नयन का धाम ॥
1104 हटने पर देती जला, निकट गया तो शीत ।आग कहाँ से पा गयी, बाला यह विपरीत ॥
1105 इच्छित ज्यों इच्छित समय, आकर दें आनन्द ।पुष्पालंकृत केशयुत, हैं बाला के स्कंध ॥
1106 लगने से हर बार है, नवजीवन का स्पंद ।बने हुए हैं अमृत के, इस मुग्धा के स्कंध ॥
1107 स्वगृह में स्वपादर्थ का, यथा बाँट कर भोग ।रहा गेहुँए रंग की, बाला से संयोग ॥
1108 आलिंगन जो यों रहा, बीच हवा-गति बंद ।दोनों को, प्रिय औ’ प्रिया, देता है आनन्द ॥
1109 मान मनावन मिलनसुख, ये जो हैं फल-भोग ।प्रेम-पाश में जो पड़े, उनको है यह भोग ॥
1110 होते होते ज्ञान के, यथा ज्ञात अज्ञान ।मिलते मिलते सुतनु से, होता प्रणय-ज्ञान ॥

अध्याय 112. सौन्दर्य वर्णन
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1111 रे अनिच्च तू धन्य है, तू है कोमल प्राण ।मेरी जो है प्रियतमा, तुझसे मृदुतर जान ॥
1112 बहु-जन-दृष्ट सुमन सदृश, इसके दृग को मान ।रे मन यदि देखो सुमन, तुम हो भ्रमित अजान ॥
1113 पल्लव तन, मोती रदन, प्राकृत गंध सुगंध ।भाला कजरारा नयन, जिसके बाँस-स्कंध ॥
1114 कुवलय दल यदि देखता, सोच झुका कर सीस ।इसके दृग सम हम नहीं, होती उसको खीस ॥
1115 धारण किया अनिच्च को, बिना निकाले वृन्त ।इसकी कटि हिन ना बजे, मंगल बाजा-वृन्द ॥
1116 महिला मुख औ’ चन्द्र में, उड्डगण भेद न जान । निज कक्षा से छूट कर, होते चलायमान ॥
1117 क्षय पाकर फिर पूर्ण हो, शोभित रहा मयंक ।इस नारी के वदन पर, रहता कहाँ कलंक ॥
1118 इस नारी के वदन सम, चमक सके तो चाँद ।प्रेम-पात्र मेरा बने, चिरजीवी रह चाँद ॥
1119 सुमन-नयन युत वदन सम, यदि होने की चाह ।सबके सम्मुख चन्द्र तू चमक न बेपरवाह ॥
1120 मृदु अनिच्च का फूल औ’, हंसी का मृदु तूल ।बाला के मृदु पाद हित, रहे गोखरू शूल ॥

अध्याय 113. प्रेम-प्रशंसा
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1121 मधुर भाषिणी सुतुनु का, सित रद निःसृत नीर ।यों लगता है मधुर वह, ज्यों मधु-मिश्रित क्षीर ॥
1122 जैसा देही देह का, होता है सम्बन्ध ।वैसा मेरे, नारि के, बीच रहा सम्बन्ध ॥
1123 पुतली में पुतली अरी, हट जाओ यह जान ।मेरी ललित ललाटयुत, प्यारी को नहिं स्थान ॥
1124 जीना सम है प्राण हित, बाला, जब संयोग ।मरना सम उसके लिये, होता अगर वियोग ॥
1125 लड़ते दृग युत बाल के, गुण यदि जाऊँ भूल ।तब तो कर सकता स्मरण, पर जाता नहिं भूल ॥
1126 दृग में से निकलें नहीं, मेरे सुभग सुजान ।झपकी लूँ तो हो न दुख, वे हैं सूक्ष्म प्राण ॥
1127 यों विचार कर नयन में, करते वास सुजान ।नहीं आंजतीं हम नयन, छिप जायेंगे जान ॥
1128 यों विचार कर हृदय में, करते वास सुजान ।खाने से डर है गरम, जल जायेंगे जान ॥
1129 झपकी लूँ तो ज्ञात है, होंगे नाथ विलीन ।पर इससे पुरजन उन्हें, कहते प्रेम विहीन ॥
1130 यद्यपि दिल में प्रिय सदा, रहे मज़े में लीन ।पुरजन कहते तज चले, कहते प्रेम विहीन ॥

अध्याय 114. लज्जा-त्याग-कथन
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1131 जो चखने पर प्रेम रस, सहें वेदना हाय ।‘मडल’-सुरक्षा के बिना, उन्हें न सबल सहाय ॥
1132 आत्मा और शरीर भी, सह न सके जो आग ।चढ़े ‘मडल’ पर धैर्य से, करके लज्जा त्याग ॥
1133 पहले मेरे पास थीं, सुधीरता और लाज ।कामी जन जिसपर चढ़ें, वही ‘मडल’ है आज ॥
1134 मेरी थी लज्जा तथा, सुधीरता की नाव ।उसे बहा कर ले गया, भीषण काम-बहाव ॥
1135 माला सम चूड़ी सजे, जिस बाला के हाथ ।उसने संध्या-विरह-दुख, दिया ‘मडल’ के साथ ॥
1136 कटती मुग्धा की वजह, आँखों में ही रात ।अर्द्ध-रात्रि में भी ‘मडल’, आता ही है याद ॥
1137 काम-वेदना जलधि में, रहती मग्न यथेष्ट ।फिर भी ‘मडल’ न जो चढे, उस स्त्री से नहिं श्रेष्ठ ॥
1138 संयम से रहती तथा, दया-पात्र अति वाम ।यह न सोच कर छिप न रह, प्रकट हुआ है काम ॥
1139 मेरा काम यही समझ, सबको वह नहिं ज्ञात ।नगर-वीथि में घूमता, है मस्ती के साथ ॥
1140 रहे भुक्त-भोगी नहीं, यथा चुकी हूँ भोग ।हँसते मेरे देखते, बुद्धि हीन जो लोग ॥

अध्याय 115. प्रवाद-जताना
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1141 प्रचलन हुआ प्रवाद का, सो टिकता प्रिय प्राण ।इसका मेरे भाग्य से, लोगों को नहिं ज्ञान ॥
1142 सुमन-नयन-युत बाल की, दुर्लभता नहिं जान ।इस पुर ने अफवाह तो, की है मुझे प्रदान ॥
1143 क्या मेरे लायक नहीं, पुरजन-ज्ञात प्रवाह ।प्राप्त किये बिन मिलन तो, हुई प्राप्त सी बात ॥
1144 पुरजन के अपवाद से, बढ़ जाता है काम ।घट जायेगा अन्यथा, खो कर निज गुण-नाम ॥
1145 होते होते मस्त ज्यों, प्रिय लगता मधु-पान ।हो हो प्रकट प्रवाद से, मधुर काम की बान ॥
1146 प्रिय से केवल एक दिन, हुई मिलन की बात ।लेकिन चन्द्रग्रहण सम, व्यापक हुआ प्रवाद ॥
1147 पुरजन-निंदा खाद है, माँ का कटु वच नीर ।इनसे पोषित रोग यह, बढ़ता रहा अधीर ॥
1148 काम-शमन की सोचना, कर अपवाद प्रचार ।अग्नि-शमन घी डाल कर, करना सदृश विचार ॥
1149 अपवादें से क्यों डरूँ, जब कर अभय प्रदान ।सब को लज्जित कर गये, छोड़ मुझे प्रिय प्राण ॥
1150 निज वांछित अपवाद का, पुर कर रहा प्रचार ।चाहूँ तो प्रिय नाथ भी, कर देंगे उपकार ॥

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