
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 26-30#
Thirukkural in Hindi, Chapters 26 to 30#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–१: धर्म- कांड
अध्याय 26. माँस- वर्जन#
251 माँस-वृद्धि अपनी समझ, जो खाता पर माँस ।कैसे दयार्द्रता-सुगुण, रहता उसके पास ॥
252 धन का भोग उन्हें नहीं, जो न करेंगे क्षेम ।माँसाहारी को नहीं, दयालुता का नेम ॥
253 ज्यों सशस्त्र का मन कभी, होता नहीं दयाल ।रुच रुच खावे माँस जो, उसके मन का हाल ॥
254 निर्दयता है जीववध. दया अहिंसा धर्म ।करना माँसाहार है, धर्म हीन दुष्कर्म ॥
255 रक्षण है सब जीव का, वर्जन करना माँस ।बचे नरक से वह नहीं, जो खाता है माँस ॥
256 वध न करेंगे लोग यदि, करने को आहार ।आमिष लावेगा नहीं, कोई विक्रयकार ॥
257 आमिष तो इक जन्तु का, व्रण है यों सुविचार ।यदि होगा तो चाहिए, तजना माँसाहार ॥
258 जीव-हनन से छिन्न जो, मृत शरीर है माँस ।दोषरहित तत्वज्ञ तो, खायेंगे नहिं माँस ॥
259 यज्ञ हज़रों क्या किया, दे दे हवन यथेष्ट ।किसी जीव को हनन कर, माँस न खाना श्रेष्ठ ॥
260 जो न करेगा जीव-वध, और न माँसाहार ।हाथ जोड़ सारा जगत, करता उसे जुहार ॥
अध्याय 27. तप#
261 तप नियमों को पालते, सहना कष्ट महान ।जीव-हानि-वर्जन तथा, तप का यही निशान ॥
262 तप भी बस उनका रहा, जिनको है वह प्राप्त ।यत्न वृथा उसके लिये, यदि हो वह अप्राप्त ॥
263 भोजनादि उपचार से, तपसी सेवा-धर्म ।करने हित क्या अन्य सब, भूल गये तप-कर्म ॥
264 दुखदायी रिपु का दमन, प्रिय जन क उत्थान ।स्मरण मात्र से हो सके, तप के बल अम्लान ॥
265 तप से सब कुछ प्राप्य हैं, जो चाहे जिस काल ।इससे तप-साधन यहाँ, करना है तत्काल ॥
266 वही पुरुष कृतकृत्य है, जो करता तप-कर्म ।करें कामवश अन्य सब, स्वहानिकारक कर्म ॥
267 तप तप कर ज्यों स्वर्ण की, होती निर्मल कान्ति ।तपन ताप से ही तपी, चमक उठें उस भाँति ॥
268 आत्म-बोध जिनको हुआ, करके वश निज जीव ।उनको करते वंदना, शेष जगत के जीव ॥
269 जिस तपसी को प्राप्त है, तप की शक्ति महान ।यम पर भी उसकी विजय, संभव है तू जान ॥
270 निर्धन जन-गणना अधिक, इसका कौन निदान ।तप नहिं करते बहुत जन, कम हैं तपोनिधान ॥
अध्याय 28. मिथ्याचार#
271 वंचक के आचार को, मिथ्यापूर्ण विलोक ।पाँचों भूत शरीरगत, हँस दे मन में रोक ॥
272 उच्च गगन सम वेष तो, क्या आवेगा काम ।समझ- बूंझ यदि मन करे, जो है दूषित काम ॥
273 महा साधु का वेष धर, दमन-शक्ति नहिं, हाय ।व्याघ्र-चर्म आढे हुए, खेत चरे ज्यों गाय ॥
274 रहते तापस भेस में, करना पापाचार ।झाड़-आड़ चिड़िहार ज्यों, पंछी पकड़े मार ॥
275 ‘हूँ विरक्त’ कह जो मनुज, करता मिथ्याचार ।कष्ट अनेकों हों उसे, स्वयं करे धिक्कार ॥
276 मोह-मुक्त मन तो नहीं, है निर्मम की बान ।मिथ्याचारी के सदृश, निष्ठुर नहीं महान ॥
277 बाहर से है लालिमा, हैं घुंघची समान ।उसका काला अग्र सम, अन्दर है अज्ञान ॥
278 नहा तीर्थ में ठाट से, रखते तापस भेस ।मित्थ्याचारी हैं बहुत, हृदय शुद्ध नहिं लेश ॥
279 टेढ़ी वीणा है मधुर, सीधा तीर कठोर ।वैसे ही कृति से परख, किसी साधु की कोर ॥
280 साधक ने यदि तज दिया, जग-निन्दित सब काम ।उसको मुंडा या जटिल, बनना है बेकाम ॥
अध्याय 29. अस्तेय#
281 निन्दित जीवन से अगर, इच्छा है बच जाय ।चोरी से पर-वस्तु की, हृदय बचाया जाय ॥
282 चोरी से पर-संपदा, पाने का कुविचार ।लाना भी मन में बुरा, है यह पापाचार ॥
283 चोरी-कृत धन में रहे, बढ़्ने का आभास ।पर उसका सीमारहित, होता ही है नाश ॥
284 चोरी के प्रति लालसा, जो होती अत्यन्त ।फल पोने के समय पर, देती दुःख अनन्त ॥
285 है गफलत की ताक में, पर-धन की है चाह ।दयाशीलता प्रेम की, लोभ न पकड़े राह ॥
286 चौर्य-कर्म प्रति हैं जिन्हें, रहती अति आसक्ति ।मर्यादा पर टिक उन्हें, चलने को नहिं शक्ति ॥
287 मर्यादा को पालते, जो रहते सज्ञान ।उनमें होता है नहीं, चोरी का अज्ञान ॥
288 ज्यों मर्यादा-पाल के, मन में स्थिर है धर्म ।त्यों प्रवंचना-पाल के, मन में वंचक कर्म ॥
289 जिन्हें चौर्य को छोड़ कर, औ’ न किसी का ज्ञान ।मर्यादा बिन कर्म कर, मिटते तभी अजान ॥
290 चिरों को निज देह भी, ढकेल कर दे छोड़ ।पालक को अस्तेय व्रत, स्वर्ग न देगा छोड़ ॥
अध्याय 30. सत्य#
291 परिभाषा है सत्य की, वचन विनिर्गत हानि ।सत्य-कथन से अल्प भी न हो किसी को ग्लानि ॥
292 मिथ्या-भाषण यदि करे, दोषरहित कल्याण ।तो यह मिथ्या-कथन भी, मानो सत्य समान ॥
293 निज मन समझे जब स्वयं, झूठ न बोलें आप ।बोलें तो फिर आप को, निज मन दे संताप ॥
294 मन से सत्याचरण का, जो करता अभ्यास ।जग के सब के हृदय में, करता है वह वास ॥
295 दान-पुण्य तप-कर्म भी, करते हैं जो लोग ।उनसे बढ़ हैं, हृदय से, सच बोलें जो लोग ॥
296 मिथ्या-भाषण त्याग सम, रहा न कीर्ति-विकास ।उससे सारा धर्म-फल, पाये बिना प्रयास ॥
297 सत्य-धर्म का आचरण, सत्य-धर्म ही मान ।अन्य धर्म सब त्यागना, अच्छा ही है जान ॥
298 बाह्य-शुद्धता देह को, देता ही है तोय ।अन्तः करण-विशुद्धता, प्रकट सत्य से जोंय ॥
299 दीपक सब दीपक नहीं, जिनसे हो तम-नाश ।सत्य-दीप ही दीप है, पावें साधु प्रकाश ॥
300 हमने अनुसन्धान से, जितने पाये तत्व ।उनमें कोई सत्य सम, पाता नहीं महत्व ॥
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