
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 31-35#
Thirukkural in Hindi, Chapters 31 to 35#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–१: धर्म- कांड
अध्याय 31. अक्रोध#
301 जहाँ चले वश क्रोध का, कर उसका अवरोध ।अवश क्रोध का क्या किया, क्या न किया उपरोध ॥
302 वश न चले जब क्रोध का, तब है क्रोध खराब ।अगर चले बश फिर वही, सबसे रहा खराब ॥
303 किसी व्यक्ति पर भी कभी, क्रोध न कर, जा भूल ।क्योंकि अनर्थों का वही, क्रोध बनेगा मूल ॥
304 हास और उल्लास को, हनन करेगा क्रोध ।उससे बढ़ कर कौन है, रिपु जो करे विरोध ॥
305 रक्षा हित अपनी स्वयं, बचो क्रोध से साफ़ ।यदि न बचो तो क्रोध ही, तुम्हें करेगा साफ़ ॥
306 आश्रित जन का नाश जो, करे क्रोध की आग ।इष्ट-बन्धु-जन-नाव को, जलायगी वह आग ॥
307 मान्य वस्तु सम क्रोध को, जो माने वह जाय ।हाथ मार ज्यों भूमि पर, चोट से न बच जाय ॥
308 अग्निज्वाला जलन ज्यों, किया अनिष्ट यथेष्ट ।फिर भी यदि संभव हुआ, क्रोध-दमन है श्रेष्ठ ॥
309 जो मन में नहिं लायगा, कभी क्रोध का ख्याल ।मनचाही सब वस्तुएँ, उसे प्राप्य तत्काल ॥
310 जो होते अति क्रोधवश, हैं वे मृतक समान ।त्यागी हैं जो क्रोध के, त्यक्त-मृत्यु सम मान ॥
अध्याय 32. अहिंसा#
311 तप-प्राप्र धन भी मिले, फिर भी साधु-सुजान ।हानि न करना अन्य की, मानें लक्ष्य महान ॥
312 बुरा किया यदि क्रोध से, फिर भी सधु-सुजान ।ना करना प्रतिकार ही, मानें लक्ष्य महान ॥
313 ‘बुरा किया कारण बिना’, करके यही विचार ।किया अगर प्रतिकार तो, होगा दुःख अपार ॥
314 बुरा किया तो कर भला, बुरा भला फिर भूल ।पानी पानी हो रहा, बस उसको यह शूल ॥
315 माने नहिं पर दुःख को, यदि निज दुःख समान ।तो होता क्या लाभ है, रखते तत्वज्ञान ॥
316 कोई समझे जब स्वयं, बुरा फलाना कर्म ।अन्यों पर उस कर्म को, नहीं करे, यह धर्म ॥
317 किसी व्यक्ति को उल्प भी, जो भी समय अनिष्ट ।मनपूर्वक करना नहीं, सबसे यही वरिष्ठ ॥
318 जिससे अपना अहित हो, उसका है दृढ़ ज्ञान ।फिर अन्यों का अहित क्यों, करता है नादान ॥
319 दिया सबेरे अन्य को, यदि तुमने संताप ।वही ताप फिर साँझ को, तुमपर आवे आप ॥
320 जो दुःख देगा अन्य को, स्वयं करे दुःख-भोग ।दुःख-वर्जन की चाह से, दुःख न दें बुधलोग ॥
अध्याय 33. वध-निशेध#
321 धर्म-कृत्य का अर्थ है, प्राणी-वध का त्याग ।प्राणी-हनन दिलायगा, सर्व-पाप-फल-भाग ॥
322 खाना बाँट क्षुधार्त्त को, पालन कर सब जीव ।शास्त्रकार मत में यही, उत्तम नीति अतीव ॥
323 प्राणी-हनन निषेध का, अद्वितीय है स्थान ।तदनन्तर ही श्रेष्ठ है, मिथ्या-वर्जन मान ॥
324 लक्षण क्या उस पंथ का, जिसको कहें सुपंथ ।जीव-हनन वर्जन करे, जो पथ वही सुपंथ ॥
325 जीवन से भयभीत हो, जो होते हैं संत ।वध-भय से वध त्याग दे, उनमें वही महंत ॥
326 हाथ उठावेगा नहीं जीवन-भक्षक काल ।उस जीवन पर, जो रहें, वध-निषेध-व्रत-पाल ॥
327 प्राण-हानि अपनी हुई, तो भी हो निज धर्म ।अन्यों के प्रिय प्राण का, करें न नाशक कर्म ॥
328 वध-मूलक धन प्राप्ति से, यद्यपि हो अति प्रेय ।संत महात्मा को वही, धन निकृष्ट है ज्ञेय ॥
329 प्राणी-हत्या की जिन्हें, निकृष्टता का भान ।उनके मत में वधिक जन, हैं चण्डाल मलान ॥
330 जीवन नीच दरिद्र हो, जिसका रुग्ण शरीर ।कहते बुथ, उसने किया, प्राण-वियुक्त शरीर ॥
अध्याय 34. अनित्यता#
331 जो है अनित्यवस्तुएँ, नित्य वस्तु सम भाव ।अल्पबुद्धिवश जो रहा, है यह नीच स्वभाव ॥
332 रंग-भूमि में ज्यो जमे, दर्शक गण की भीड़ ।जुड़े प्रचुर संपत्ति त्यों, छँटे यथा वह भीड़ ॥
333 धन की प्रकृति अनित्य है, यदि पावे ऐश्वर्य ।तो करना तत्काल ही, नित्य धर्म सब वर्य ॥
334 काल-मान सम भासता, दिन है आरी-दांत ।सोचो तो वह आयु को, चीर रहा दुर्दान्त ॥
335 जीभ बंद हो, हिचकियाँ लगने से ही पूर्व ।चटपट करना चाहिये, जो है कर्म अपूर्व ॥
336 कल जो था, बस, आज तो, प्राप्त किया पंचत्व ।पाया है संसार ने, ऐसा बड़ा महत्व ॥
337 अगले क्षण क्या जी रहें, इसका है नहिं बोध ।चिंतन कोटिन, अनगिनत, करते रहें अबोध ॥
338 अंडा फूट हुआ अलग, तो पंछी उड़ जाय ।वैसा देही-देह का, नाता जाना जाय ॥
339 निद्रा सम ही जानिये, होता है देहान्त ।जगना सम है जनन फिर, निद्रा के उपरान्त ॥
340 आत्मा का क्या है नहीं, कोई स्थायी धाम ।सो तो रहती देह में, भाड़े का सा धाम ॥
अध्याय 35. संन्यास#
341 ज्यों ज्यों मिटती जायगी, जिस जिसमें आसक्ति ।त्यों त्यों तद्गत दुःख से, मुक्त हो रहा व्यक्ति ॥
342 संन्यासी यदि बन गया, यहीं कई आनन्द ।संन्यासी बन समय पर, यदि होना आनन्द ॥
343 दृढ़ता से करना दमन, पंचेन्द्रियगत राग ।उनके प्रेरक वस्तु सब, करो एकदम त्याग ॥
344 सर्वसंग का त्याग ही, तप का है गुण-मूल ।बन्धन फिर तप भंग कर, बने अविद्या-मूल ॥
345 भव- बन्धन को काटते, बोझा ही है देह ।फिर औरों से तो कहो, क्यों संबन्ध- सनेह ॥
346 अहंकार ममकार को, जिसने किया समाप्त ।देवों को अप्राप्य भी, लोक करेगा प्राप्त ॥
347 अनासक्त जो न हुए, पर हैं अति आसक्त ।उनको लिपटें दुःख सब, और करें नहिं त्यक्त ॥
348 पूर्ण त्याग से पा चुके, मोक्ष- धाम वे धन्य ।भव- बाधा के जाल में, फँसें मोह- वश अन्य ॥
349 मिटते ही आसक्ति के, होगी भव से मुक्ति ।बनी रहेगी अन्यथा, अनित्यता की भुक्ति ॥
350 वीतराग के राग में, हो तेरा अनुराग ।सुदृढ़ उसी में रागना, जिससे पाय विराग ॥
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