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Thirukkural in Hindi Chapter 36 to 40 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 36-40
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Thirukkural in Hindi, Chapters 36 to 40
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Chapters 31 to 35 · All chapters · Chapter list · Chapters 41 to 45

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–१: धर्म- कांड

अध्याय 36. तत्वज्ञान
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351 मिथ्या में जब सत्य का, होता भ्रम से भान ।देता है भव-दुःख को, भ्रममूलक वह ज्ञान ।
352 मोह-मुक्त हो पा गये, निर्मल तत्वज्ञान ।भव-तम को वह दूर कर, दे आनन्द महान ॥
353 जिसने संशय-मुक्त हो, पाया ज्ञान-प्रदीप ।उसको पृथ्वी से अधिक, रहता मोक्ष समीप ॥
354 वशीभूत मन हो गया, हुई धारणा सिद्ध ।फिर भी तत्वज्ञान बिन, फल होगा नहिं सिद्ध ॥
355 किसी तरह भी क्यों नहीं, भासे अमुक पदार्थ ।तथ्य-बोध उस वस्तु का, जानो ज्ञान पथार्थ ॥
356 जिसने पाया श्रवण से, यहीं तत्व का ज्ञान ।मोक्ष-मार्ग में अग्रसर, होता वह धीमान ॥
357 उपदेशों को मनन कर, सत्य-बोध हो जाय ।पुनर्जन्म की तो उन्हें, चिन्ता नहिं रह जाय ॥
358 जन्म-मूल अज्ञान है, उसके निवारणार्थ ।मोक्ष-मूल परमार्थ का, दर्शन ज्ञान पथार्थ ॥
359 जगदाश्रय को समझ यदि, बनो स्वयं निर्लिप्त ।नाशक भावी दुःख सब, करें कभी नहिं लिप्त ॥
360 काम क्रोध औ’ मोह का न हो नाम का योग ।तीनों के मिटते, मिटे, कर्म-फलों का रोग ॥

अध्याय 37. तृष्णा का उ़न्मूलन
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361 सर्व जीव को सर्वदा, तृष्णा-बीज अचूक ।पैदा करता है वही, जन्म-मरण की हूक ॥
362 जन्म-नाश की चाह हो, यदि होनी है चाह ।चाह-नाश की चाह से, पूरी हो वह चाह ॥
363 तृष्णा-त्याग सदृश नहीं, यहाँ श्रेष्ठ धन-धाम ।स्वर्ग-धाम में भी नहीं, उसके सम धन-धाम ॥
364 चाह गई तो है वही, पवित्रता या मुक्ति ।करो सत्य की चाह तो, होगी चाह-विमुक्ति ॥
365 कहलाते वे मुक्त हैं, जो हैं तृष्णा-मुक्त ।सब प्रकार से, अन्य सब, उतने नहीं विमुक्त ॥
366 तृष्णा से डरते बचे, है यह धर्म महान ।न तो फँसाये जाल में, पा कर असावधान ॥
367 तृष्णा को यदि कर दिया, पूरा नष्ट समूल ।धर्म-कर्म सब आ मिले, इच्छा के अनुकूल ॥
368 तृष्णा-त्यागी को कभी, होगा ही नहिं दुःख ।तृष्णा के वश यदि पड़े,होगा दुःख पर दुःख ॥
369 तृष्णा का यदि नाश हो, जो है दुःख कराल ।इस जीवन में भी मनुज, पावे सुख चिरकाल ॥
370 तृष्णा को त्यागो अगर, जिसकी कभी न तुष्टि ।वही दशा दे मुक्ति जो, रही सदा सन्तुष्टि ॥

अध्याय 38. प्रारब्ध
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371 अर्थ-वृद्धि के भाग्य से, हो आलस्य-अभाव ।अर्थ-नाश के भाग्य से, हो आलस्य स्वभाव ॥
372 अर्थ-क्षयकर भाग्य तो, करे बुद्धि को मन्द ।अर्थ-वृद्धिकर भाग्य तो, करे विशाल अमन्द ॥
373 गूढ़ शास्त्र सीखें बहुत, फिर भी अपना भाग्य ।मन्द बुद्धि का हो अगर, हावी मांद्य अभाग्य ॥
374 जगत-प्रकृति है नियतिवश, दो प्रकार से भिन्न ।श्रीयुत होना एक है, ज्ञान-प्राप्ति है भिन्न ॥
375 धन अर्जन करत समय, विधिवश यह हो जाय ।बुरा बनेगा सब भला, बुरा भला बन जाय ॥
376 कठिन यत्न भी ना रखे, जो न रहा निज भाग ।निकाले नहीं निकलता, जो है अपने भाग ॥
377 भाग्य-विद्यायक के किये, बिना भाग्य का योग ।कोटि चयन के बाद भी, दुर्लभ है सुख-भोग ॥
378 दुःख बदे जो हैं उन्हें, यदि न दिलावें दैव ।सुख से वंचित दीन सब, बनें विरक्त तदैव ॥
379 रमता है सुख-भोग में, फल दे जब सत्कर्म ।गड़बड़ करना किसलिये, फल दे जब दुष्कर्म ॥
380 बढ़ कर भी प्रारब्ध से, क्या है शक्ति महान ।जयी वही उसपर अगर, चाल चलावे आन ॥

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 39. महीश महिमा
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381 सैन्य राष्ट्र धन मित्रगण, दुर्ग अमात्य षड़ंग ।राजाओं में सिंह है, जिसके हों ये संग ॥
382 दानशीलता निडरपन, बुद्धि तथा उत्साह ।इन चारों से पूर्ण हो, स्वभाव से नरनाह ॥
383 धैर्य तथा अविलंबना, विद्या भी हो साथ ।ये तीनों भू पाल को, कभी न छोड़ें साथ ॥
384 राजधर्म से च्युत न हो, दूर अधर्म निकाल ।वीरधर्म से च्युत न हो, मानी वही नृपाल ॥
385 कर उपाय धन-वृद्धि का, अर्जन भी कर खूब ।रक्षण, फिर विनियोग में, सक्षम जो वह भूप ॥
386 दर्शन जिसके सुलभ हैं, और न वचन कठोर ।ऐसे नृप के राज्य की, शंसा हो बरजोर ॥
387 जो प्रिय वचयुत दान कर, ढिता रक्षण-भार ।बनता उसके यश सहित, मनचाहा संसार ॥
388 नीति बरत कर भूप जो, करता है जन-रक्ष ।प्रजा मानती है उसे, ईश तुल्य प्रत्यक्ष ॥
389 जिस नृप में बच कर्ण कटु, शने का संस्कार ।उसकी छत्रच्छाँह में, टिकता है संसार ॥
390 प्रजा-सुरक्षण प्रिय वचन, तथा सुशासन दान ।इन चारों से पूर्ण नृप, महीप-दीप समान ॥

अध्याय 40. शिक्षा
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391 सीख सीखने योग्य सब, भ्रम संशय बिन सीख ।कर उसके अनुसार फिर, योग्य आचरण ठीक ॥
392 अक्षर कहते है जिसे, जिसको कहते आँक ।दोनों जीवित मनुज के, कहलाते हैं आँख ॥
393 कहलाते हैं नेत्रयुत, जो हैं विद्यावान ।मुख पर रखते घाव दो, जो है अपढ़ अजान ॥
394 हर्षप्रद होता मिलन, चिन्ताजनक वियोग ।विद्वज्जन का धर्म है, ऐसा गुण-संयोग ॥
395 धनी समक्ष दरिद्र सम, झुक झुक हो कर दीन ।शिक्षित बनना श्रेष्ठ है, निकृष्ट विद्याहीन ॥
396 जितना खोदो पुलिन में, उतना नीर-निकास ।जितना शिक्षित नर बने, उतना बुद्धि-विकास ॥
397 अपना है विद्वान का, कोई पुर या राज ।फिर क्यों रहता मृत्यु तक, कोई अपढ़ अकाज ॥
398 जो विद्या इक जन्म में, नर से पायी जाय ।सात जन्म तक भी उसे, करती वही सहाय ॥
399 हर्ष हेतु अपने लिये, वैसे जग हित जान ।उस विद्या में और रत, होते हैं विद्वान ॥
400 शिक्षा-धन है मनुज हित, अक्षय और यथेष्ट ।अन्य सभी संपत्तियाँ, होती हैं नहिं श्रेष्ठ ॥

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