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Thirukkural in Hindi Chapter 46 to 50 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 46-50
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Thirukkural in Hindi, Chapters 46 to 50
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Chapters 41 to 45 · All chapters · Chapter list · Chapters 51 to 55

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 46. कुसंग-वर्जन
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451 ओछों से डरना रहा, उत्तम जन की बान ।गले लगाना बन्धु सम, है ओछों की बान ॥
452 मिट्टी गुणानुसार ज्यों, बदले वारि-स्वभाव ।संगति से त्यों मनुज का, बदले बुद्धि-स्वभाव ॥
453 मनोजन्य है मनुज का, प्राकृत इन्द्रियज्ञान ।ऐसा यह यों नाम तो, संग-जन्य है जान ॥
454 मनोजन्य सा दीखता, भले बुरे का ज्ञान ।संग-जन्य रहता मगर, नर का ऐसा ज्ञान ॥
455 मन की होना शुद्धता, तथा कर्म की शुद्धि ।दोनों का अवलंब है, संगति की परिशुद्धि ॥
456 पातें सत्सन्तान हैं, जिनका है मन शुद्ध ।विफल कर्म होता नहीं, जिनका रंग विशुद्ध ॥
457 मन की शुद्धि मनुष्य को, देती है ऐश्वर्य ।सत्संगति तो फिर उसे, देती सब यश वर्य ॥
458 शुद्ध चित्तवाले स्वतः, रहते साधु महान ।सत्संगति फिर भी उन्हें, करती शक्ति प्रदान ॥
459 चित्त-शुद्धि परलोक का, देती है आनन्द ।वही शुद्धि सत्संग से होती और बुलन्द ॥
460 साथी कोई है नहीं, साध- संग से उच्च ।बढ़ कर कुसंग से नहीं, शत्रु हानिकर तुच्छ ॥

अध्याय 47. सुविचारित कार्य-कुशलता
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461 कर विचार व्यय-आय का, करना लाभ-विचार ।फिर हो प्रवृत्त कार्य में, करके सोच-विचार ॥
462 आप्तों से कर मंत्रणा, करता स्वयं विचार ।उस कर्मी को है नहीं, कुछ भी असाध्य कार ॥
463 कितना भावी लाभ हो, इसपर दे कर ध्यान ।पूँजी-नाशक कर्म तो, करते नहिं मतिमान ॥
464 अपयश के आरोप से, जो होते हैं भीत ।शुरू न करते कर्म वे, स्पष्ट न जिसकी रीत ॥
465 टूट पडे जो शत्रु पर, बिन सोचे सब मर्म ।शत्रु-गुल्म हित तो बने, क्यारी ज्यों वह कर्म ॥
466 करता अनुचित कर्म तो, होता है नर नष्ट ।उचित कर्म को छोड़ता, तो भी होता नष्ट ॥
467 होना प्रवृत्त कर्म में, करके सोच-विचार ।‘हो कर प्रवृत्त सोच लें’, है यह गलत विचार ॥
468 जो भी साध्य उपाय बिन, किया जायगा यत्न ।कई समर्थक क्यों न हों, खाली हो वह यत्न ॥
469 बिन जाने गुण शत्रु का, यदि उसके अनुकूल ।किया गया सदुपाय तो, उससे भी हो भूल ॥
470 अनुपयुक्त जो है तुम्हें, जग न करे स्वीकार ।करना अनिंध कार्य ही, करके सोच-विचार ॥

अध्याय 48. शक्ति का बोध
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471 निज बल रिपु-बल कार्य-बल, साथी-बल भी जान ।सोच-समझ कर चाहिये, करना कार्य निदान ॥
472 साध्य कार्य को समझ कर, समझ कार्य हित ज्ञेय ।जम कर धावा जो करे, उसको कुछ न अजेय ॥
473 बोध नहीं निज शक्ति का, वश हो कर उत्साह ।कार्य शुरू कर, बीच में, मिटे कई नरनाह ॥
474 शान्ति-युक्त बरबात बिन, निज बल मान न जान ।अहम्मन्य भी जो रहे, शीघ्र मिटेगा जान ॥
475 मोर-पंख से ही सही, छकड़ा लादा जाय ।यदि लादो वह अत्यधिक, अक्ष भग्न हो जाय ॥
476 चढ़ा उच्चतम डाल पर, फिर भी जोश अनंत ।करके यदि आगे बढ़े, होगा जीवन-अंत ॥
477 निज धन की मात्रा समझ, करो रीती से दान ।जीने को है क्षेम से, उचित मार्ग वह जान ॥
478 तंग रहा तो कुछ नहीं, धन आने का मार्ग ।यदि विस्तृत भी ना रहा, धन जाने का मार्ग ॥
479 निज धन की सीमा समझ, यदि न किया निर्वाह ।जीवन समृद्ध भासता, हो जायगा तबाह ॥
480 लोकोपकारिता हुई, धन-सीमा नहिं जान ।तो सीमा संपत्ति की, शीघ्र मिटेगी जान ॥

अध्याय 49. समय का बोध
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481 दिन में उल्लू पर विजय, पा लेता है काक ।नृप जिगीषु को चाहिये, उचित समय की ताक ॥
482 लगना जो है कार्य में, अवसर को पहचान ।श्री को जाने से जकड़, रखती रस्सी जान ॥
483 है क्या कार्य असाध्य भी, यदि अवसर को जान ।समिचित साधन के सहित, करता कार्य सुजान ॥
484 चाहे तो भूलोक भी, आ जायेगा हाथ ।समय समझ कर यदि करे, युक्त स्थान के साथ ॥
485 जिनको निश्चित रूप से, विश्व-विजय की चाह ।उचित समय की ताक में, वें हैं बेपरवाह ॥
486 रहता है यों सिकुड़ नृप, रखते हुए बिसात ।ज्यों मेढ़ा पीछे हटे, करने को आघात ॥
487 रूठते न झट प्रगट कर, रिपु-अति से नरनाह ।पर कुढ़ते हैं वे सुधी, देख समय की राह ॥
488 रिपु को असमय देख कर, सिर पर ढो संभाल ।सिर के बल गिर वह मिटे, आते अन्तिम काल ॥
489 दुर्लभ अवसर यदि मिले, उसको खोने पूर्व ।करना कार्य उसी समय, जो दुष्कर था पूर्व ॥
490 बक सम रहना सिकुड़ कर, जब करना नहिं वार ।चोंच-मार उसकी यथा, पा कर समय, प्रहार ॥

अध्याय 50. स्थान का बोध
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491 कोई काम न कर शुरू, तथा न कर उपहास ।जब तक रिपु को घेरने, स्थल की है नहिं आस ॥
492 शत्रु-भाव से पुष्ट औ’, जो हों अति बलवान ।उनको भी गढ़-रक्ष तो, बहु फल करे प्रदान ॥
493 निर्बल भी बन कर सबल, पावें जय-सम्मान ।यदि रिपु पर धावा करें, ख़ोज सुरक्षित स्थान ॥
494 रिपु निज विजय विचार से, धो बैठेंगे हाथ ।स्थान समझ यदि कार्य में, जुड़ते दृढ नरनाथ ॥
495 गहरे जल में मगर की, अन्यों पर हो जीत ।जल से बाहर अन्य सब, पावें जय विपरीत ॥
496 भारी रथ दृढ चक्रयुत, चले न सागर पार ।सागरगामी नाव भी, चले न भू पर तार ॥
497 निर्भय के अतिरिक्त तो, चाहिये न सहकार ।उचित जगह पर यदि करें, खूब सोच कर कार ॥
498 यदि पाता लघु-सैन्य-युत, आश्रय स्थल अनुकूल ।उसपर चढ़ बहु-सैन्य युत, होगा नष्ट समूल ॥
499 सदृढ़ दुर्ग साधन बड़ा, है नहिं रिपु के पास ।फिर भी उसके क्षेत्र में, भिड़ना व्यर्थ प्रयास ॥
500 जिस निर्भय गजराज के, दन्तलग्न बरछैत ।गीदड़ भी मारे उसे, जब दलदल में कैंद ॥

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