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Thirukkural in Hindi Chapter 56 to 60 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 56-60
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Thirukkural in Hindi, Chapters 56 to 60
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Chapters 51 to 55 · All chapters · Chapter list · Chapters 61 to 65

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 56. क्रूर-शासन
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551 हत्यारे से भी अधिक, वह राजा है क्रूर ।जो जन को हैरान कर, करे पाप भरपूर ॥
552 भाला ले कर हो खड़े, डाकू की ज्यों माँग ।राजदण्डयुत की रही, त्यों भिक्षा की माँग ॥
553 दिन दिन नीति विचार कर, नृप न करे यदि राज ।ह्रासोन्मुख होता रहे, दिन दिन उसका राज ॥
554 नीतिहीन शासन करे, बिन सोचे नरनाथ ।तो वह प्रजा व वित्त को, खो बैठे इक साथ ॥
555 उतपीड़ित जन रो पड़े, जब वेदना अपार ।श्री का नाशक शास्त्र है, क्या न नेत्र-जल-धार ॥
556 नीतिपूर्ण शासन रखे, नृप का वश चिरकाल ।नीति न हो तो, भूप का, यश न रहे सब काल ॥
557 अनावृष्टि से दुःख जो, पाती भूमि अतीव ।दयावृष्टि बिन भूप की, पाते हैं सब जिव ॥
558 अति दुःखद है सधनता, रहने से धनहीन ।यदि अन्यायी राज के, रहना पड़े अधीन ॥
559 यदि राजा शासन करे, राजधर्म से चूक ।पानी बरसेगा नहीं, ऋतु में बादल चूक ॥
560 षटकर्मी को स्मृति नहीं, दूध न देगी गाय ।यदि जन-रक्षक भूप से, रक्षा की नहिं जाय ॥

अध्याय 57. भयकारी कर्म न करना
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561 भूप वही जो दोष का, करके उचित विचार ।योग्य दण्ड से इस तरह, फिर नहिं हो वह कार ॥
562 राजश्री चिरकाल यदि, रखना चाहें साथ ।दिखा दण्ड की उग्रता, करना मृदु आघात ॥
563 यदि भयकारी कर्म कर, करे प्रजा को त्रस्त ।निश्चय जल्दी कूर वह, हो जावेगा अस्त ॥
564 जिस नृप की दुष्कीर्ति हो, ‘राजा है अति क्रूर’ ।अल्प आयु हो जल्द वह, होगा नष्ट ज़रूर ॥
565 अप्रसन्न जिसका वदन, भेंट नहीं आसान ।ज्यों अपार धन भूत-वश, उसका धन भी जान ॥
566 कटु भाषी यदि हो तथा, दया-दृष्टि से हीन ।विपुल विभव नृप का मिटे, तत्क्षण हो स्थितिहीन ॥
567 कटु भाषण नृप का तथा, देना दण्ड अमान ।शत्रु-दमन की शक्ति को, घिसती रेती जान ॥
568 सचिवों की न सलाह ले, फिर होने पर कष्ट ।आग-बबूला नृप हुआ, तो श्री होगी नष्ट ॥
569 दुर्ग बनाया यदि नहीं, रक्षा के अनुरूप ।युद्ध छिड़ा तो हकबका, शीघ्र मिटे वह भूप ॥
570 मूर्खों को मंत्री रखे, यदि शासक बहु क्रूर ।उनसे औ’ नहिं भूमि को, भार रूप भरपूर ॥

अध्याय 58. दया-दृष्टि
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571 करुणा रूपी सोहती, सुषमा रही अपार ।नृप में उसके राजते, टिकता है संसार ॥
572 करुणा से है चल रहा, सांसारिक व्यवहार ।जो नर उससे रहित है, केवल भू का भार ॥
573 मेल न हो तो गान से, तान करे क्या काम ।दया न हो तो दृष्टि में, दृग आये क्या काम ॥
574 करुणा कलित नयन नहीं, समुचित सीमाबद्ध ।तो क्या आवें काम वे, मुख से रह संबन्ध ॥
575 आभूषण है नेत्र का, करुणा का सद्‍भाव ।उसके बिन जाने उसे, केवल मुख पर घाव ॥
576 रहने पर भी आँख के, जिसके है नहिं आँख ।यथा ईख भू में लगी, जिसके भी हैं आँख ॥
577 आँखहीन ही हैं मनुज, यदि न आँख का भाव ।आँखयुक्त में आँख का, होता भी न अभाव ॥
578 हानि बिना निज धर्म की, करुणा का व्यवहार ।जो कर सकता है उसे, जग पर है अधिकार ॥
579 अपनी क्षति भी जो करे, उसपर करुणा-भाव ।धारण कर, करना क्षमा, नृप का श्रेष्ठ स्वभाव ॥
580 देख मिलाते गरल भी, खा जाते वह भोग ।वाँछनीय दाक्षिण्य के, इच्छुक हैं जो लोग ॥

अध्याय 59. गुप्तचर-व्यवस्था
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581 जो अपने चर हैं तथा, नीतिशास्त्र विख्यात ।ये दोनों निज नेत्र हैं, नृप को होना ज्ञात ॥
582 सब पर जो जो घटित हों, सब बातें सब काल ।राजधर्म है जानना, चारों से तत्काल ॥
583 बात चरों से जानते, आशय का नहिं ज्ञान ।तो उस नृप की विजय का, मार्ग नहीं है आन ॥
584 राजकर्मचारी, स्वजन, तथा शत्रु जो वाम ।सब के सब को परखना, रहा गुप्तचर-काम ॥
585 रूप देख कर शक न हो, आँख हुई, निर्भीक ।कहीं कहे नहिं मर्म को, सक्षम वह चर ठीक ॥
586 साधु वेष में घुस चले, पता लगाते मर्म ।फिर कुछ भी हो चुप रहे, यही गुप्तचर-कर्म ॥
587 भेद लगाने में चतुर, फिर जो बातें ज्ञात ।उनमें संशयरहित हो, वही भेदिया ख्यात ॥
588 पता लगा कर भेद का, लाया यदि इक चार ।भेद लगा फिर अन्य से, तुलना कर स्वीकार ॥
589 चर चर को जाने नहीं, यों कर शासन-कर्म ।सत्य मान, जब तीन चर, कहें एक सा मर्म ॥
590 खुले आम जासूस का, करना मत सम्मान ।अगर किया तो भेद को, प्रकट किया खुद जान ॥

अध्याय 60. उत्साहयुक्तता
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591 धनी कहाने योग्य है, यदि हो धन उत्साह ।उसके बिन यदि अन्य धन, हो तो क्या परवाह ॥
592 एक स्वत्व उत्साह है, स्थायी स्वत्व ज़रूर ।अस्थायी रह अन्य धन, हो जायेंगे दूर ॥
593 रहता जिनके हाथ में, उमंग का स्थिर वित्त ।‘वित्त गया’ कहते हुए, ना हों अधीर-चित्त ॥
594 जिस उत्साही पुरुष का, अचल रहे उत्साह ।वित्त चले उसके यहाँ, पूछ-ताछ कर राह ॥
595 जलज-नाल उतनी बड़ी, जितनी जल की थाह ।नर होता उतना बड़ा, जितना हो उत्साह ॥
596 जो विचार मन में उठें, सब हों उच्च विचार ।यद्यपि सिद्ध न उच्चता, विफल न वे सुविचार ॥
597 दुर्गति में भी उद्यमी, होते नहीं अधीर ।घायल भी शर-राशि से, गज रहता है धीर ॥
598 ‘हम तो हैं इस जगत में, दानी महा धुरीण’ ।कर सकते नहिं गर्व यों, जो हैं जोश-विहीन ॥
599 यद्यपि विशालकाय है, तथा तेज़ हैं दांत ।डरता है गज बाघ से, होने पर आक्रांत ॥
600 सच्ची शक्ति मनुष्य की, है उत्साह अपार ।उसके बिन नर वृक्ष सम, केवल नर आकार ॥

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