
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 66-70#
Thirukkural in Hindi, Chapters 66 to 70#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 66. कर्म-शुद्धि#
651 साथी की परिशुद्धता, दे देती है प्रेय ।कर्मों की परिशुद्धता, देती है सब श्रेय ॥
652 सदा त्यागना चाहिये, जो हैं ऐसे कर्म ।कीर्ति-लाभ के साथ जो, देते हैं नहिं धर्म ॥
653 ‘उन्नति करनी चाहिये’, यों जिनको हो राग ।निज गौरव को हानिकर, करें कर्म वे त्याग ॥
654 यद्यपि संकट-ग्रस्त हों, जिनका निश्चल ज्ञान ।निंद्य कर्म फिर भी सुधी, नहीं करेंगे जान ॥
655 जिससे पश्चात्ताप हो, करो न ऐसा कार्य ।अगर किया तो फिर भला, ना कर ऐसा कार्य ॥
656 जननी को भूखी सही, यद्यपि देखा जाय ।सज्जन-निन्दित कार्य को, तो भी किया न जाय ॥
657 दोष वहन कर प्राप्त जो, सज्जन को ऐश्वर्य ।उससे अति दारिद्रय ही, सहना उसको वर्य ॥
658 वर्ज किये बिन वर्ज्य सब, जो करता दुष्कर्म ।कार्य-पूर्ति ही क्यों न हो, पीड़ा दें वे कर्म ॥
659 रुला अन्य को प्राप्त सब, रुला उसे वह जाय ।खो कर भी सत्संपदा, पीछे फल दे जाय ॥
660 छल से धन को जोड़ कर, रखने की तदबीर ।कच्चे मिट्टी कलश में, भर रखना ज्यों नीर ॥
अध्याय 67. कर्म में दृढ़ता#
661 दृढ़ रहना ही कर्म में, मन की दृढ़ता जान ।दृढ़ता कहलाती नहीं, जो है दृढ़ता आन ॥
662 दुष्ट न करना, यदि हुआ, तो फिर न हो अधीर ।मत यह है नीतिज्ञ का, दो पथ मानें मीर ॥
663 प्रकट किया कर्मान्त में, तो है योग्य सुधीर ।प्रकट किया यदि बीच में, देगा अनन्त पीर ॥
664 कहना तो सब के लिये, रहता है आसान ।करना जो जैसा कहे, है दुस्साध्य निदान ॥
665 कीर्ति दिला कर सचित को, कर्म-निष्ठता-बान ।नृप पर डाल प्रभाव वह, पावेगी सम्मान ॥
666 संकल्पित सब वस्तुएँ, यथा किया संकल्प ।संकल्पक का जायगा, यदि वह दृढ़-संकल्प ॥
667 तिरस्कार करना नहीं, छोटा क़द अवलोक ।चलते भारी यान में, अक्ष-आणि सम लोग ॥
668 सोच समझ निश्चय किया, करने का जो कर्म ।हिचके बिन अविलम्ब ही, कर देना वह कर्म ॥
669 यद्यपि होगा बहुत दुख, दृढ़ता से काम ।सुख-फल दायक ही रहा, जिसका शुभ परिणाम ॥
670 अन्य विषय में सदृढ़ता, रखते सचिव सुजान ।यदि दृढ़ता नहिं कर्म की, जग न करेगा मान ॥
अध्याय 68. कर्म करने की रीति#
671 निश्चय कर लेना रहा, विचार का परिणाम ।हानि करेगा देर से, रुकना निश्चित काम ॥
672 जो विलम्ब के योग्य है, करो उसे सविलम्ब ।जो होना अविलम्ब ही, करो उसे अविलम्ब ॥
673 जहाँ जहाँ वश चल सके, भलाकार्य हो जाय ।वश न चले तो कीजिये, संभव देख उपाय ॥
674 कर्म-शेष रखना तथा, शत्रु जनों में शेष ।अग्नि-शेष सम ही करें, दोनों हानि विशेष ॥
675 धन साधन अवसर तथा, स्थान व निश्चित कर्म ।पाँचों पर भ्रम के बिना, विचार कर कर कर्म ॥
676 साधन में श्रम, विघ्न भी, पूरा हो जब कर्म ।प्राप लाभ कितना बड़ा, देख इन्हें कर कर्म ॥
677 विधि है कर्मी को यही, जब करता है कर्म ।उसके अति मर्मज्ञ से, ग्रहण करे वह मर्म ॥
678 एक कर्म करते हुए, और कर्म हो जाय ।मद गज से मद-मत्त गज, जैसे पकड़ा जाय ॥
679 करने से हित कार्य भी, मित्रों के उपयुक्त ।शत्रु जनों को शीघ्र ही, मित्र बनाना युक्त ॥
680 भीति समझकर स्वजन की, मंत्री जो कमज़ोर ।संधि करेंगे नमन कर, रिपु यदि है बरज़ोर ॥
अध्याय 69. दूत#
681 स्नेहशीलता उच्चकुल, नृप-इच्छित आचार ।राज-दूत में चाहिये, यह उत्तम संस्कार ॥
682 प्रेम बुद्धिमानी तथा, वाक्शक्ति सविवेक ।ये तीनों अनिवार्य हैं, राजदूत को एक ॥
683 रिपु-नृप से जा जो करे, निज नृप की जय-बात ।लक्षण उसका वह रहे, विज्ञों में विख्यात ॥
684 दूत कार्य हित वह चले, जिसके रहें अधीन ।शिक्षा अनुसंधानयुत, बुद्धि, रूप ये तीन ॥
685 पुरुष वचन को त्याग कर, करे समन्वित बात ।लाभ करे प्रिय बोल कर, वही दूत है ज्ञात ॥
686 नीति सीख हर, हो निडर, कर प्रभावकर बात ।समयोचित जो जान ले, वही दूत है ज्ञात ॥
687 स्थान समय कर्तव्य भी, इनका कर सुविचार ।बात करे जो सोच कर, उत्तम दूत निहार ॥
688 शुद्ध आचरण संग-बल, तथा धैर्य ये तीन ।इनके ऊपर सत्यता, लक्षण दूत प्रवीण ॥
689 नृप को जो संदेशवह, यों हो वह गुण-सिद्ध ।भूल चूक भी निंद्य वच, कहे न वह दृढ़-चित्त ॥
690 चाहे हो प्राणान्त भी, निज नृप का गुण-गान ।करता जो भय के बिना, दूत उसी को जान ॥
अध्याय 70. राजा से योग्य व्यवहार#
691 दूर न पास न रह यथा, तापों उसी प्रकार ।भाव-बदलते भूप से, करना है व्यवहार ॥
692 राजा को जो प्रिय रहें, उनकी हो नहिं चाह ।उससे स्थायी संपदा, दिलायगा नरनाह ॥
693 यदि बचना है तो बचो, दोषों से विकराल ।समाधान सभव नहीं, शक करते नरपाल ॥
694 कानाफूसी साथ ही, हँसी अन्य के साथ ।महाराज के साथ में, छोड़ो इनका साथ ॥
695 छिपे सुनो मत भेद को, पूछो मत ‘क्या बात’ ।प्रकट करे यदि नृप स्वयं, तो सुन लो वह बात ॥
696 भाव समझ समयज्ञ हो, छोड़ घृणित सब बात ।नृप-मनचाहा ढंग से, कह आवश्यक बात ॥
697 नृप से वांछित बात कह, मगर निरर्थक बात ।पूछें तो भी बिन कहे, सदा त्याग वह बात ॥
698 ‘छोटे हैं, ये बन्धु हैं’, यों नहिं कर अपमान ।किया जाय नरपाल का, देव तुल्य सम्मान ॥
699 ‘नृप के प्रिय हम बन गये’, ऐसा कर सुविचार ।जो हैं निश्चल बुद्धि के, करें न अप्रिय कार ॥
700 ‘चिरपरिचित हैं’, यों समझ, नृप से दुर्व्यवहार ।करने का अधिकार तो, करता हानि अपार ॥
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