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Thirukkural in Hindi Chapter 71 to 75 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 71-75
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Thirukkural in Hindi, Chapters 71 to 75
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Chapters 66 to 70 · All chapters · Chapter list · Chapters 76 to 80

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 71. भावज्ञता
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701 बिना कहे जो जान ले, मुख-मुद्रा से भाव ।सदा रहा वह भूमि का, भूषण महानुभाव ॥
702 बिना किसी संदेह के, हृदयस्थित सब बात ।जो जाने मानो उसे, देव तुल्य साक्षात ॥
703 मनोभाव मुख-भाव से, जो जानता निहार ।अंगों में कुछ भी दिला, करो उसे स्वीकार ॥
704 बिना कहे भावज्ञ हैं, उनके सम भी लोग ।आकृति में तो हैं मगर, रहें भिन्न वे लोग ॥
705 यदि नहिं जाना भाव को, मुख-मुद्रा अवलोक ।अंगों में से आँख का, क्या होगा उपयोग ॥
706 बिम्बित करता स्फटिक ज्यों, निकट वस्तु का रंग ।मन के अतिशय भाव को, मुख करता बहिरंग ॥
707 मुख से बढ़ कर बोधयुत, है क्या वस्तु विशेष ।पहले वह बिम्बित करे, प्रसन्नता या द्वेष ॥
708 बीती समझे देखकर, यदि ऐसा नर प्राप्त ।अभिमुख उसके हो खड़े, रहना है पर्याप्त ॥
709 बतलायेंगे नेत्र ही, शत्रु-मित्र का भाव ।अगर मिलें जो जानते, दृग का भिन्न स्वभाव ॥
710 जो कहते हैं, ‘हम रहे’, सूक्ष्म बुद्धि से धन्य ।मान-दण्ड उनका रहा, केवल नेत्र, न अन्य ॥

अध्याय 72. सभा-ज्ञान
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711 शब्द-शक्ति के ज्ञानयुत, जो हैं पावन लोग ।समझ सभा को, सोच कर, करना शब्द-प्रयोग ॥
712 शब्दों की शैली समझ, जिनको है अधिकार ।सभासदों का देख रुख़, बोलें स्पष्ट प्रकार ॥
713 उद्यत हो जो बोलने, सभा-प्रकृति से अज्ञ ।भाषण में असमर्थ वे, शब्द-रीति से अज्ञ ॥
714 प्राज्ञों के सम्मुख रहो, तुम भी प्राज्ञ सुजान ।मूर्खों के सम्मुख बनो, चून सफेद समान ॥
715 भले गुणों में है भला, ज्ञानी गुरुजन मध्य ।आगे बढ़ बोलें नहीं, ऐसा संयम पथ्य ॥
716 विद्वानों के सामने, जिनका विस्तृत ज्ञान ।जो पा गया कलंक, वह, योग-भ्रष्ट समान ॥
717 निपुण पारखी शब्द के, जो हैं, उनके पास ।विद्वत्ता शास्त्रज्ञ की, पाती खूब प्रकाश ॥
718 बुद्धिमान के सामने, जो बोलता सुजान ।क्यारी बढ़ती फसल की, यथा सींचना जान ॥
719 सज्जन-मण्डल में करें, जो प्रभावकर बात ।मूर्ख-सभा में भूल भी, करें न कोई बात ॥
720 यथा उँडेला अमृत है, आंगन में अपवित्र ।भाषण देना है वहाँ, जहाँ न गण हैं मित्र ॥

अध्याय 73. सभा में निर्भीकता
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721 शब्द शक्ति के ज्ञानयुत, जो जन हैं निर्दोष ।प्राज्ञ-सभा में ढब समझ, करें न शब्द सदोष ॥
722 जो प्रभावकर ढ़ंग से, आर्जित शास्त्र-ज्ञान ।प्रगटे विज्ञ-समझ, वह, विज्ञों में विद्वान ॥
723 शत्रु-मध्य मरते निडर, मिलते सुलभ अनेक ।सभा-मध्य भाषण निडर, करते दुर्लभ एक ॥
724 विज्ञ-मध्य स्वज्ञान की, कर प्रभावकर बात ।अपने से भी विज्ञ से, सीखो विशेष बात ॥
725 सभा-मध्य निर्भीक हो, उत्तर देने ठीक ।शब्द-शास्त्र, फिर ध्यान से, तर्क-शास्त्र भी सीख ॥
726 निडर नहीं हैं जो उन्हें, खाँडे से क्या काम ।सभा-भीरु जो हैं उन्हें, पोथी से क्या काम ॥
727 सभा-भीरु को प्राप्त है, जो भी शास्त्र-ज्ञान ।कायर-कर रण-भूमि में, तीक्षण खड्ग समान ॥
728 रह कर भी बहु शास्त्रविद, है ही नहिं उपयोग ।विज्ञ-सभा पर असर कर, कह न सके जो लोग ॥
729 जो होते भयभीत हैं, विज्ञ-सभा के बीच ।रखते शास्त्रज्ञान भी, अनपढ़ से हैं नीच ॥
730 जो प्रभावकर ढ़ंग से, कह न सका निज ज्ञान ।सभा-भीरु वह मृतक सम, यद्यपि है सप्राण ॥

अध्याय 74. राष्ट्र
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731 अक्षय उपज सुयोग्य जन, ह्रासहीन धनवान ।मिल कर रहते हैं जहाँ, है वह राष्ट्र महान ॥
732 अति धन से कमनीय बन, नाशहीनता युक्त ।प्रचुर उपज होती जहाँ, राष्ट्र वही है उक्त ॥
733 एक साथ जब आ पड़ें, तब भी सह सब भार ।देता जो राजस्व सब, है वह राष्ट्र अपार ॥
734 भूख अपार न है जहाँ, रोग निरंतर है न ।और न नाशक शत्रु भी, श्रेष्ठ राष्ट्र की सैन ॥
735 होते नहीं, विभिन्न दल, नाशक अंतर-वैर ।नृप-कंटक खूनी नहीं, वही राष्ट्र है, ख़ैर ॥
736 नाश न होता, यदि हुआ, तो भी उपज यथेष्ट ।जिसमें कम होती नहीं, वह राष्ट्रों में श्रेष्ठ ॥
737 कूप सरोवर नद-नदी, इनके पानी संग ।सुस्थित पर्वत सुदृढ़ गढ़, बनते राष्ट्र-सुअंग ॥
738 प्रचुर उपज, नीरोगता, प्रसन्नता, ऐश्वर्य ।और सुरक्षा, पाँच हैं, राष्ट्र-अलंकृति वर्य ॥
739 राष्ट्र वही जिसकी उपज, होती है बिन यत्न ।राष्ट्र नहीं वह यदि उपज, होती है कर यत्न ॥
740 उपर्युक्त साधन सभी, होते हुए अपार ।प्रजा-भूप-सद्‍भाव बिन, राष्ट्र रहा बेकार ॥

अध्याय 75. दुर्ग
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741 आक्रामक को दुर्ग है, साधन महत्वपूर्ण ।शरणार्थी-रक्षक वही, जो रिपु-भय से चूर्ण ॥
742 मणि सम जल, मरु भूमि औ’, जंगल घना पहाड़ ।कहलाता है दुर्ग वह, जब हो इनसे आड़ ॥
743 उँचा, चौड़ा और दृढ़, अगम्य भी अत्यंत ।चारों गुणयुत दुर्ग है, यों कहते हैं ग्रन्थ ॥
744 अति विस्तृत होते हुए, रक्षणीय थल तंग ।दुर्ग वही जो शत्रु का, करता नष्ट उमंग ॥
745 जो रहता दुर्जेय है, रखता यथेष्ट अन्न ।अंतरस्थ टिकते सुलभ, दुर्ग वही संपन्न ॥
746 कहलाता है दुर्ग वह, जो रख सभी पदार्थ ।देता संकट काल में, योग्य वीर रक्षार्थ ॥
747 पिल पड़ कर या घेर कर, या करके छलछिद्र ।जिसको हथिया ना सके, है वह दुर्ग विचित्र ॥
748 दुर्ग वही यदि चतुर रिपु, घेरा डालें घोर ।अंतरस्थ डट कर लडें, पावें जय बरज़ोर ॥
749 शत्रु-नाश हो युद्ध में, ऐसे शस्त्र प्रयोग ।करने के साधन जहाँ, है गढ़ वही अमोघ ॥
750 गढ़-रक्षक रण-कार्य में, यदि हैं नहीं समर्थ ।अत्युत्तम गढ़ क्यों न हो, होता है वह व्यर्थ ॥

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