
तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 81-85#
Thirukkural in Hindi, Chapters 81 to 85#
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Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).
भाग–२: अर्थ- कांड
अध्याय 81. चिर-मैत्री#
801 जो कुछ भी अधिकार से, करते हैं जन इष्ट ।तिरस्कार बिन मानना, मैत्री कहो धनिष्ठ ॥
802 हक्र से करना कार्य है, मैत्री का ही अंग ।फ़र्ज़ समझ सज्जन उसे, मानें सहित उमंग ॥
803 निज कृत सम जो मित्र का, साधिकार कृत काम ।यदि स्वीकृत होता नहीं, चिर-मैत्री क्या काम ॥
804 पूछे बिन हक मान कर, मित्र करे यदि कार्य ।वांछनीय गुण के लिये, मानें वह स्वीकार्य ॥
805 दुःखजनक यदि कार्य हैं, करते मित्र सुजान ।अति हक़ या अज्ञान से, यों करते हैं जान ॥
806 चिरपरिचित घन मित्र से, यद्यपि हुआ अनिष्ट ।मर्यादी छोडें नहीं, वह मित्रता धनिष्ठ ॥
807 स्नेही स्नेह-परंपरा, जो करते निर्वाह ।मित्र करे यदि हानि भी, तज़ें न उसकी चाह ॥
808 मित्र-दोष को ना सुनें, ऐसे मित्र धनिष्ठ ।मानें उस दिन को सफल, दोष करें जब इष्ट ॥
809 अविच्छिन्न चिर-मित्रता, जो रखते हैं यार ।उनका स्नेह तजें न जो, उन्हें करे जग प्यार ॥
810 मैत्री का गुण पालते, चिरपरिचित का स्नेह ।जो न तजें उस सुजन से, करें शत्रु भी स्नेह ॥
अध्याय 82. बुरी मैत्री#
811 यद्यपि अतिशय मित्र सम, दिखते हैं गुणहीन ।बढ़ने से वह मित्रता, अच्छा यदि हो क्षीण ॥
812 पा या खो कर क्या हुआ, अयोग्य का सौहार्द ।जो मैत्री कर स्वार्थवश, तज दे जब नहिं स्वार्थ ॥
813 मित्र बने जो गणन कर, स्वार्थ-लाभ का मान ।धन-गाहक गणिका तथा, चोर एक सा जान ॥
814 अनभ्यस्त हय युद्ध में, पटक चले ज्यों भाग ।ऐसों के सौहार्द से, एकाकी बड़भाग ॥
815 तुच्छ मित्रता विपद में, जो देती न सहाय ।ना होने में है भला, होने से भी, हाय ॥
816 अति धनिष्ठ बन मूर्ख का, हो जाने से इष्ट ।समझदार की शत्रुता, लाखों गुणा वरिष्ठ ॥
817 हास्य-रसिक की मित्रता, करने से भी प्राप्त ।भले बनें दस कोटि गुण, रिपु से जो हों प्राप्त ॥
818 यों असाध्य कह साध्य को, जो करता न सहाय ।चुपके से उस ढोंग की, मैत्री छोड़ी जाय ॥
819 कहना कुछ करना अलग, जिनकी है यह बान ।उनकी मैत्री खायगी, सपने में भी जान ॥
820 घर पर मैत्री पालते, सभा-मध्य धिक्कार ।जो करते वे तनिक भी, निकट न आवें, यार ॥
अध्याय 83. कपट-मैत्री#
821 अंतरंग मैत्री नहीं, पर केवल बहिरंग ।अवसर पा वह पीटती, पकड़ निहाई ढ़ंग ।
822 बन्धु सदृश पर बन्धु नहिं, उनकी मैत्री-बान ।है परिवर्तनशील ही, नारी-चित्त समान ॥
823 सद्ग्रंथों का अध्ययन, यद्यपि किया अनेक ।शत्रु कभी होंगे नहीं, स्नेह-मना सविवेक ॥
824 मुख पर मधुर हँसी सहित, हृदय वैर से पूर ।ऐसे लोगों से डरो, ये हैं वंचक कूर ॥
825 जिससे मन मिलता नहीं, उसका सुन वच मात्र ।किसी विषय में मत समझ, उसे भरोसा पात्र ॥
826 यद्यपि बोलें मित्र सम, हितकर वचन गढ़ंत ।शत्रु-वचन की व्यर्थता, होती प्रकट तुरंत ॥
827 सूचक है आपत्ति का, धनुष नमन की बान ।सो रिपु-वचन-विनम्रता, निज हितकर मत जान ॥
828 जुड़े हाथ में शत्रु के, छिप रहता हथियार ।वैसी ही रिपु की रही, रुदन-अश्रु-जल-धार ॥
829 जो अति मैत्री प्रकट कर, मन में करता हास ।खुश कर मैत्री भाव से, करना उसका नाश ॥
830 शत्रु, मित्र जैसा बने, जब आवे यह काल ।मुख पर मैत्री प्रकट कर, मन से उसे निकाल ॥
अध्याय 84. मूढ़ता#
831 किसको कहना मूढ़ता, जो है दारुण दाग ।हानिप्रद को ग्रहण कर, लाभप्रद का त्याग ॥
832 परम मूढ़ता मूढ़ में, जानो उसे प्रसिद्ध ।उन सब में आसक्ति हो, जो हैं कर्म निषिद्ध ॥
833 निर्दयता, निर्लज्जता, निर्विचार का भाव ।पोषण भी नहिं पोष्य का, ये हैं मूढ़ स्वभाव ॥
834 शास्त्रों का कर अध्यपन, अर्थ जानते गूढ़ ।शिक्षक भी, पर नहिं वशी, उनसे बडा न मूढ़ ॥
835 सात जन्म जो यातना, मिले नरक के गर्त्त ।मूढ़ एक ही में बना, लेने में सुसमर्थ ॥
836 प्रविधि-ज्ञान बिन मूढ़ यदि, शुरू करेगा काम ।वह पहनेगा हथकड़ी, बिगड़ेगा ही काम ॥
837 जम जाये तो प्रचुर धन, अगर मूढ़ के पास ।भोग करेंगे अन्य जन, परिजन तो उपवास ॥
838 लगना है संपत्ति का, एक मूढ़ के हस्त ।पागल का होना यथा, ताड़ी पी कर मस्त ॥
839 पीड़ा तो देती नहीं, जब होती है भंग ।सो मूढ़ों की मित्रता, है अति मधुर प्रसंग ॥
840 सुधी-सभा में मूढ़ का, घुसना है यों, ख़ैर ।ज्यों रखना धोये बिना, स्वच्छ सेज पर पैर ॥
अध्याय 85. अहम्मन्य-मूढ़ता#
841 सबसे बुरा अभाव है, सद्बुद्धि का अभाव ।दुनिया अन्य अभाव को, नहिं मानती अभाव ॥
842 बुद्धिहीन नर हृदय से, करता है यदि दान ।प्रातिग्राही का सुकृत वह, और नहीं कुछ जान ॥
843 जितनी पीड़ा मूढ़ नर, निज को देता आप ।रिपु को भी संभव नहीं, देना उतना ताप ॥
844 हीन-बुद्धि किसको कहें, यदि पूछोगे बात ।स्वयं मान ‘हम हैं सुधी’, भ्रम में पड़ना ज्ञात ॥
845 अपठित में ज्यों पठित का, व्यंजित करना भाव ।सुपठित में भी दोष बिन, जनमे संशय-भाध ॥
846 मिटा न कर निज दोष को, गोपन कर अज्ञान ।ढकना पट से गुहय को, अल्प बुद्धि की बान ॥
847 प्रकट करे मतिहीन जो, अति सहस्य की बात ।अपने पर खुद ही बड़ा, कर लेगा आघात ॥
848 समझाने पर ना करे, और न समझे आप ।मरण समय तक जीव वह, रहा रोग-अभिशाप ॥
849 समझाते नासमझ को, रहे नासमझ आप ।समझदार सा नासमझ, स्वयं दिखेगा आप ॥
850 जग जिसके अस्तित्व को, ‘है’ कह लेता मान ।जो न मानता वह रहा, जग में प्रेत समान ॥
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