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Thirukkural in Hindi Chapter 86 to 90 - तिरुक्कूरळ

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Sanskrit Text Thiruvalluvar Thirukkural in Hindi

तिरुक्कूरळ - हिन्दी अनुवाद Chapter 86-90
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Thirukkural in Hindi, Chapters 86 to 90
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Chapters 81 to 85 · All chapters · Chapter list · Chapters 91 to 95

Each chapter has ten verses. The Hindi text is the translation of M.G. Venkatakrishnan (1998).

भाग–२: अर्थ- कांड

अध्याय 86. विभेद
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851 सब जीवों में फूट ही, कहते हैं बुध लोग ।अनमिल-भाव-अनर्थ का, पोषण करता रोग ॥
852 कोई अनमिल भाव से, कर्म करे यदि पोच ।अहित न करना है भला, भेद-भाव को सोच ॥
853 रहता है दुःखद बड़ा, भेद-भाव का रोग ।उसके वर्जन से मिले, अमर कीर्तिका भोग ॥
854 दुःखों में सबसे बड़ा, है विभेद का दुःख ।जब होता है नष्ट वह, होता सुख ही सुक्ख ॥
855 उठते देख विभेद को, हट कर रहे समर्थ ।उसपर कौन समर्थ जो, सोचे जय के अर्थ ॥
856 भेद-वृद्धि से मानता, मिलता है आनन्द ।जीवन उसका चूक कर, होगा नष्ट तुरन्त ॥
857 करते जो दुर्बुद्धि हैं, भेद-भाव से प्रति ।तत्व-दर्श उनको नहीं, जो देता है जीत ॥
858 हट कर रहना भेद से, देता है संपत्ति ।उससे अड़ कर जीतना, लाता पास विपत्ति ॥
859 भेद-भाव नहिं देखता, तो होती संपत्ति ।अधिक देखना है उसे, पाना है आपत्ति ॥
860 होती हैं सब हानियाँ, भेद-भाव से प्राप्त ।मैत्री से शुभ नीति का, उत्तम धन है प्राप्त ॥

अध्याय 87. शत्रुता-उत्कर्ष
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861 बलवानों से मत भिड़ो, करके उनसे वैर ।कमज़ोरों की शत्रुता, सदा चाहना ख़ैर ॥
862 प्रेम रहित निज बल रहित, सबल सहाय न पास ।कर सकता है किस तरह, शत्रु शक्ति का नाश ॥
863 अनमिल है कंजूस है, कायर और अजान ।उसपर जय पाना रहा, रिपु को अति आसान ॥
864 क्रोधी हो फिर हृदय से, जो दे भेद निकाल ।उसपर जय सबको सुलभ, सब थल में, सब काल ॥
865 नीतिशास्त्र जो ना पढे, विधिवत् करे न काम ।दुर्जन निंदा-भय-रहित, रिपु हित है सुख-धाम ॥
866 जो रहता क्रोधान्ध है, कामी भी अत्यन्त ।है उसका शत्रुत्व तो, वांछनीय सानन्द ॥
867 करके कार्यारम्भ जो, करता फिर प्रतिकूल ।निश्चय उसकी शत्रुता, करना दे भी मूल ॥
868 गुणविहीन रहते हुए, यदि हैं भी बहुदोष ।तो है वह साथी रहित, रिपु को है संतोष ॥
869 यदि वैरी कायर तथा, नीतिशास्त्र अज्ञात ।उनसे भिड़ते, उच्च सुख, छोड़ेंगे नहिं साथ ॥
870 अनपढ़ की कर शत्रुता, लघुता से जय-लाभ ।पाने में असमर्थ जो, उसे नहीं यश-लाभ ॥

अध्याय 88. सत्रु-शक्ति का ज्ञान
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871 रिपुता नामक है वही, असभ्यता-अवगाह ।हँसी-मज़े में भी मनुज, उसकी करे न चाह ॥
872 धनु-हल-धारी कृषक से, करो भले ही वैर ।वाणी-हल-धर कृषक से, करना छोड़ो वैर ॥
873 एकाकी रह जो करे, बहुत जनों से वैर ।पागल से बढ़ कर रहा, बुद्धिहीन वह, खैर ॥
874 मित्र बना कर शत्रु को, जो करता व्यवहार ।महिमा पर उस सभ्य की, टिकता है संसार ॥
875 अपना तो साथी नहीं, रिपु हैं दो, खुद एक ।तो उनमें से ले बना, उचित सहायक एक ॥
876 पूर्व-ज्ञात हो परख कर, अथवा हा अज्ञात् ।नाश-काल में छोड़ दो, शत्रु-मित्रता बात ॥
877 दुःख न कह उस मित्र से, यदि खुद उसे न ज्ञात ।प्रकट न करना शत्रु से, कमज़ोरी की बात ॥
878 ढ़ंग समझ कर कर्म का, निज बल को कर चंड ।अपनी रक्षा यदि करे, रिपु का मिटे घमंड ॥
879 जब पौधा है काटना, जो तरु कांटेदार ।बढ़ने पर घायल करे, छेदक का कर दार ॥
880 जो रिपुओं के दर्प का, कर सकते नहिं नाश ।निश्चय रिपु के फूँकते, होता उनका नाश ॥

अध्याय 89. अन्तवैंर
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881 छाया, जल भी हैं बुरे, जब करते हैं हानि ।स्वजन-भाव भी हैं बुरे, यदि देते हैं ग्लानि ॥
882 डरना मत उस शत्रु से, जो है खड्ग समान ।डर उस रिपु के मेल से, जो है मित्र समान ॥
883 बचना अन्त: शत्रु से, उनके खा कर त्रास ।मिट्टी-छेदक ज्यों करें, थका देख वे नाश ॥
884 मन में बिना लगाव के, यदि हो अन्तवैंर ।बन्धु-भेद-कारक कई, करता है वह गैर ॥
885 यदि होता बन्धुत्व में, कोई अन्तवैंर ।मृत्युजनक जो सो कई, करता है वह गैर ॥
886 आश्रित लोगों से निजी, यदि होता है वैर ।सदा असंभव तो रहा, बचना नाश-बगैर ॥
887 डब्बा-ढक्कन योग सम, रहने पर भी मेल ।गृह में अन्तवैंर हो, तो होगा नहिं मेल ॥
888 रेती से घिस कर यथा, लोहा होता क्षीण ।गृह भी अन्तवैंर से, होता है बलहीन ॥
889 अति छोटा ही क्यों न हो, तिल में यथा दरार ।फिर भी अन्तवैंर तो, है ही विनाशकार ॥
890 जिनसे मन मिलता नहीं, जीवन उनके संग ।एक झोंपड़ी में यथा, रहना सहित भुजंग ॥

अध्याय 90. बड़ों का उपचार न करना
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891 सक्षम की करना नहीं, क्षमता का अपमान ।रक्षा हित जो कार्य हैं, उनमें यही महान ॥
892 आदर न कर महान का, करे अगर व्यवहार ।होगा उसे महान से, दारुण दुःख अपार ॥
893 करने की सामर्थ्य है, जब चाहें तब नाश ।उनका अपचारी बनो, यदि चाहो निज नाश ॥
894 करना जो असमर्थ का, समर्थ का नुक़सान ।है वह यम को हाथ से, करना ज्यों आह्‍वान ॥
895 जो पराक्रमी भूप के, बना कोप का पात्र ।बच कर रह सकता कहाँ, कहीं न रक्षा मात्र ॥
896 जल जाने पर आग से, बचना संभव जान ।बचता नहीं महान का, जो करता अपमान ॥
897 तप:श्रेष्ठ हैं जो महा, यदि करते हैं कोप ।क्या हो धन संपत्ति की, और विभव की ओप ॥
898 जो महान हैंअचल सम, करते अगर विचार ।जग में शाश्वत सम धनी, मिटता सह परिवार ॥
899 उत्तम व्रतधारी अगर, होते हैं नाराज ।मिट जायेगा इन्द्र भी, गँवा बीच में राज ॥
900 तप:श्रेष्ठ यदि क्रुद्ध हों, रखते बडा प्रभाव ।रखते बड़े सहाय भी, होता नहीं बचाव ॥

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